दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के नजदीक स्थित ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद को खाली करने के लिए जारी किए गए नोटिस ने विवाद खड़ा कर दिया है। मस्जिद से जुड़े लोगों के अनुसार, परिसर खाली करने के लिए छह दिन का समय दिया गया है। इस मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB), जमीयत उलेमा-ए-हिंद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने चिंता जताई है। वहीं, संबंधित सरकारी भूमि कार्यालय का पक्ष है कि यह निर्माण सरकारी जमीन पर है।
मामले में सबसे बड़ा सवाल मस्जिद की ऐतिहासिक पहचान, जमीन के स्वामित्व और उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों को लेकर है। एक ओर मस्जिद प्रबंधन इसे वक्फ संपत्ति बताता है, तो दूसरी ओर भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) इसे सरकारी जमीन पर बना निर्माण मानता है।
करीब 125 साल पुरानी बताई जाती है मस्जिद
रेस कोर्स मस्जिद का निर्माण लगभग 125 साल पहले हुआ बताया जाता है। दिल्ली वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी तनवीर अहमद के अनुसार, मस्जिद और उससे जुड़ा करीब दो बीघा का कब्रिस्तान 8 सितंबर 1977 को दिल्ली प्रशासन की राजपत्र अधिसूचना के तहत वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया था।
मस्जिद के समर्थकों का कहना है कि इसका नाम नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) की विरासत सूची में 22वें स्थान पर दर्ज है। इसके अतिरिक्त, मस्जिद के UMEED पोर्टल पर पंजीकृत होने की बात भी कही गई है।
इन दस्तावेजों को मस्जिद की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति के समर्थन में प्रस्तुत किया जा रहा है। हालांकि, जमीन के स्वामित्व और निर्माण की वैधता को लेकर संबंधित पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
मस्जिद को क्या नोटिस दिया गया है?
मस्जिद के इमाम के अनुसार, परिसर खाली करने को लेकर अधिकारियों की ओर से छह दिन की समयसीमा बताई गई है। उनका कहना है कि मस्जिद को खाली कराने के संबंध में उन्हें मौखिक रूप से जानकारी मिली थी। वहीं, अधिकारियों की ओर से परिसर खाली करने का नोटिस दिए जाने की बात सामने आई है।
मस्जिद से जुड़े लोगों का दावा है कि 7 अक्टूबर को इलाके में झुग्गियों को हटाने की कार्रवाई के दौरान मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति भी बंद कर दी गई थी। इसके बाद से नमाजियों की आवाजाही पर भी असर पड़ा है।
इमाम के मुताबिक, मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। कभी अंदर जाने की इजाजत मिलती है, तो कभी प्रवेश रोक दिया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि बाहरी लोगों के प्रवेश पर पाबंदी लगाए जाने के कारण नमाजियों को परेशानी हो रही है।
इमाम ने क्या कहा?
मस्जिद के इमाम ने बताया कि वह करीब 40 वर्षों से यहां अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं और उनके अनुसार, इस दौरान मस्जिद को लेकर पहले कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया था।
उनका कहना है कि 7 अक्टूबर को आसपास की झुग्गियों को हटाने की कार्रवाई के बाद मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई। उन्होंने मस्जिद और कब्रिस्तान को वक्फ संपत्ति बताते हुए कहा कि मामले की जानकारी दिल्ली वक्फ बोर्ड को दे दी गई है।
इमाम के अनुसार, वक्फ बोर्ड ने इस संबंध में L&DO को पत्र लिखकर मस्जिद की स्थिति से अवगत कराया है। उनका दावा है कि चाणक्यपुरी की तत्कालीन एसडीएम गीता ग्रोवर ने 29 अक्टूबर 2025 को जो सर्वे किया था, उसमें मस्जिद का उल्लेख नहीं था। इमाम का कहना है कि उसी सर्वे के आधार पर आगे की कार्रवाई की गई।
हालांकि, सर्वे और जमीन से संबंधित दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति को लेकर संबंधित पक्षों के दावों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है।
सरकारी जमीन पर निर्माण का दावा
नई दिल्ली नगरपालिका परिषद के अधिकारियों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, इलाके में की जा रही कार्रवाई केवल मस्जिद तक सीमित नहीं है। इससे आसपास रहने वाले कई परिवार भी प्रभावित हुए हैं।
बताया गया कि मस्जिद प्रबंधन को अक्टूबर में परिसर खाली करने के लिए नोटिस दिया गया था और इसके लिए छह दिन की समयसीमा निर्धारित की गई थी। नोटिस में जमीन को केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय के अधीन बताया गया है।
L&DO का पक्ष है कि संबंधित निर्माण सरकारी भूमि पर है और इसे अनधिकृत कब्जे की श्रेणी में माना जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, आसपास के प्रभावित निवासियों को भी परिसर खाली करने के लिए कहा गया है और कुछ लोगों को दूसरी जगह वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराए गए हैं।
इस तरह विवाद का प्रमुख पहलू यह है कि मस्जिद प्रबंधन वक्फ और ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हवाला दे रहा है, जबकि सरकारी पक्ष भूमि पर अपने अधिकार और निर्माण की वैधता को लेकर अलग रुख रखता है।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने किरेन रिजिजू को सौंपा ज्ञापन
मस्जिद से लंबे समय से जुड़े मोहम्मद हारून के मुताबिक, अधिकारियों ने परिसर खाली करने के लिए छह दिन का समय दिया है। उन्होंने बिजली-पानी की आपूर्ति बंद किए जाने और प्रवेश द्वारों को बंद किए जाने की बात भी कही।
इस बीच, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। प्रतिनिधिमंडल ने रेस कोर्स मस्जिद और सफदरजंग मकबरे के पीछे स्थित कब्रिस्तान के मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की।
ज्ञापन के जरिए संबंधित पक्षों ने मस्जिद और कब्रिस्तान को लेकर उठे विवाद का समाधान निकालने तथा उपलब्ध दस्तावेजों पर विचार करने की अपील की।
असदुद्दीन ओवैसी ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 20 अक्टूबर को केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से इस मामले में दखल देने की अपील की। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मस्जिद को वर्ष 1977 से वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया गया था, तो वक्फ बोर्ड ने संबंधित कार्रवाई को चुनौती देने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए।
ओवैसी ने धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों और वक्फ संशोधन कानून को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने सरकार से नोटिस वापस लेने और मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
उनकी मांग है कि मामले में उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की जाए और विवाद का समाधान कानूनी प्रक्रिया के तहत निकाला जाए।
मीरवाइज उमर फारूक ने भी जताई चिंता
कश्मीर के धार्मिक नेता मीरवाइज उमर फारूक ने भी रेस कोर्स मस्जिद को खाली कराने के नोटिस पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया में मस्जिद के वक्फ रिकॉर्ड और विरासत सूची में शामिल होने से संबंधित दावों का उल्लेख किया।
उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मस्जिद ऐतिहासिक और वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है, तो उसके संरक्षण के लिए संबंधित अधिकारी प्रभावी कदम क्यों नहीं उठा रहे हैं। उन्होंने इस मामले को धार्मिक स्थलों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों के संदर्भ में भी उठाया।
AIMPLB ने नोटिस वापस लेने की मांग की
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र सरकार से L&DO की ओर से जारी नोटिस वापस लेने की मांग की है। बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई पर आपत्ति जताई।
उन्होंने कहा कि मस्जिद के ऐतिहासिक अस्तित्व और कानूनी स्थिति के समर्थन में सरकारी रिकॉर्ड मौजूद होने का दावा किया जाता है। उनके मुताबिक, मस्जिद का नाम NDMC की विरासत सूची में दर्ज है और वर्ष 1977 की राजपत्र अधिसूचना में भी इसका उल्लेख होने की बात कही जाती है। उन्होंने अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड का भी हवाला दिया।
इलियास ने मांग की कि सरकार इन दस्तावेजों की अनदेखी करने के बजाय मामले की समीक्षा करे। बोर्ड का कहना है कि जमीन और निर्माण से जुड़े विवाद पर कोई अंतिम कदम उठाने से पहले उपलब्ध ऐतिहासिक तथा कानूनी रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए।
रेस कोर्स मस्जिद मामले में अब क्या स्थिति है?
रेस कोर्स मस्जिद का मामला फिलहाल जमीन के अधिकार, वक्फ के रूप में दर्ज होने और निर्माण की वैधता से जुड़े अलग-अलग दावों के बीच उलझा हुआ है। मस्जिद प्रबंधन और मुस्लिम संगठनों ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई रोकने की मांग की है, जबकि सरकारी भूमि कार्यालय संबंधित जमीन को सरकारी संपत्ति बताते हुए निर्माण को अनधिकृत मानता है।
मामले की आगे की स्थिति संबंधित दस्तावेजों की जांच, प्रशासनिक निर्णय और संभावित कानूनी कार्रवाई पर निर्भर करेगी। मस्जिद के वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज होने का दावा और जमीन पर सरकारी अधिकार का पक्ष—दोनों के बीच विवाद का समाधान आधिकारिक रिकॉर्ड तथा लागू कानूनों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगा।
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