सच्चे तो बस अहलेबैत (अ) ही हैं।
فَمَنْ حَاجَّک فِیهِ مِن بَعْدِ مَا جَاءَک مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ
أَبْنَاءَنَا وَأَبْنَاءَکمْ وَنِسَاءَنَا وَنِسَاءَکمْ وَأَنفُسَنَا وَأَنفُسَکمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ
فَنَجْعَللَّعْنَتَ اللَّهِ عَلَی الْکاذِبِینَ
(ऐ पैग़म्बर!) इल्म आ जाने के बाद जो लोग तुम से कटहूज्जती करें उनसे कह दीजिए कि आओ हम लोग अपने अपने बेटों, अपनी अपनी औरतों और अपने अपने नफ़्सों (अपने जैसों) को बुलाएं और फिर ख़ुदा की बारगाह में दुआ करें और झूठों पर ख़ुदा की लानत क़रार दें। (सूरा ए आले इमरान, आयत 61)

क्रिश्चियनस पादरी अल्लाह के बारे में रसूल अल्लाह (स) से डिबेट कर रहे थे और इस बात पर अड़ गए कि हज़रत ईसा मसीह अल्लाह के बेटे हैं।
फिर यह आयत नाज़िल हुई।
आयत में क्रिश्चियनिटी के मुक़ाबले और उनसे मुबाहिले के लिए, रसूल अल्लाह (स) से उन लोगों को ले जाने की बात कही जा रही है जिनकी दुआ कभी रद्द न होती हो और जो सच्चे हों
इस आयत में अल्लाह ने जमा (बहुवचन) के सीग़े इस्तेमाल करके इसका सर्किल बहुत बड़ा कर दिया है। जिसका मतलब यह है कि रसूले अकरम (स) इस क्वालिटी के बहुत सारे लोगों को ले जा सकते हैं।
लेकिन रसूल अल्लाह (स) ख़ूद तशरीफ़ ले गये और अपने नफ़्सों (अपने जैसों) से सिर्फ इमाम अली अलैहिस्सलाम, और औरतों से सिर्फ़ जनाबे फ़ातेमा ज़हरा (स) को लिया और अपने बच्चों में इमाम हसन (अ) और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को ले गए।
जिसका मतलब यह है कि जनाबे फ़ातेमा ज़हरा (स), आप (स) के बाबा, आपके शौहर (अ) और आपके बच्चों में (अ) ही यह क्वालिटी मौजूद थी, बाक़ी किसी में नहीं।
अगर इस क्वालिटी का कोई और होता तो रसूल अल्लाह (स) उसे भी साथ ले जाते, मगर कोई था ही नहीं।
– पैग़म्बर नौगांवी
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