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गोरखपुर में रावण दहन के बाद राख-लकड़ी लेने उमड़ी भीड़, लोगों को बुरी नजर से बचाव की उम्मीद

गोरखपुर: दशहरे पर रावण दहन के बाद गोरखपुर के बर्डघाट रामलीला मैदान में एक खास नजारा देखने को मिला। रावण के पुतले का दहन होते ही वहां मौजूद सैकड़ों लोग उसकी जली हुई लकड़ियां और राख इकट्ठा करने लगे। कोई पुतले में इस्तेमाल हुई बांस की लकड़ी लेकर जाता दिखाई दिया, तो कोई राख समेटकर अपने साथ ले जाने में जुटा रहा।

स्थानीय लोगों के बीच रावण दहन के बाद बचे अवशेष घर ले जाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। लोगों की मान्यता है कि इन लकड़ियों और राख को घर में रखने से बुरी नजर से बचाव होता है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। हालांकि, इस परंपरा का पालन करने वाले कई लोगों को इसके पीछे की ऐतिहासिक वजह के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है।

कुछ लोगों का कहना है कि वे बचपन से अपने परिवार के बड़े-बुजुर्गों को रावण दहन के बाद लकड़ी और राख घर ले जाते देखते आए हैं। इसी वजह से उन्होंने भी इस परंपरा को अपनी दिनचर्या और आस्था का हिस्सा बना लिया है।

बुजुर्गों से मिली परंपरा, घर में रखने से नहीं लगती बुरी नजर

स्थानीय निवासी सूरज वर्मा के अनुसार, उनके मोहल्ले में बुजुर्गों के बीच यह मान्यता प्रचलित है कि रावण एक महान विद्वान था, लेकिन भगवान श्रीराम के हाथों उसके वध के साथ उसकी बुराइयों का अंत हुआ। इसी विश्वास के चलते कुछ लोग रावण दहन के बाद बची लकड़ियों को घर ले जाते हैं।

सूरज ने बताया कि लोग इन लकड़ियों को घर में सुरक्षित रखते हैं या किसी स्थान पर टांग देते हैं। उनकी मान्यता है कि ऐसा करने से नकारात्मकता दूर रहती है और परिवार को बुरी नजर से बचाने में मदद मिलती है।

उनके मुताबिक, यह परंपरा किसी एक परिवार तक सीमित नहीं है। इलाके के कई लोग वर्षों से इसका पालन करते आ रहे हैं। हालांकि, सभी लोगों को इस परंपरा के पीछे की मान्यता या इसकी शुरुआत के बारे में पूरी जानकारी नहीं है।

परिवार की खुशहाली और बुद्धि के लिए भी शुभ मानते हैं लोग

रावण के पुतले की जली हुई लकड़ी अपने साथ ले जा रहे अनुज सोनकर ने बताया कि वह भी हर साल इस परंपरा का पालन करते हैं। उनके अनुसार, धार्मिक मान्यताओं में रावण को विद्वान और शक्तिशाली व्यक्तित्व के रूप में भी याद किया जाता है।

अनुज का कहना है कि इसी वजह से कुछ लोग रावण दहन के बाद बची लकड़ी को शुभ मानकर घर ले जाते हैं। इसे घर में सुरक्षित रखने से परिवार की समृद्धि और बुद्धि के विकास का विश्वास जुड़ा हुआ है।

रावण दहन के बाद मैदान में मौजूद लोगों के बीच लकड़ी और राख लेने की उत्सुकता इसी लोकविश्वास को दर्शाती है। कई लोग इसे अपनी पुरानी पारिवारिक परंपरा मानते हैं और हर साल दशहरे पर इसे निभाने पहुंचते हैं।

राख और लकड़ी को लेकर अलग-अलग लोक मान्यताएं

दशहरे पर रावण दहन के बाद पुतले की राख और लकड़ी घर लाने की परंपरा के पीछे अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ लोग इसे बुरी नजर से बचाव से जोड़ते हैं, जबकि अन्य का विश्वास है कि इससे घर में खुशहाली आती है और नकारात्मकता दूर रहती है।

कुछ परिवार इन अवशेषों को धन-संपत्ति में वृद्धि और सुख-समृद्धि का प्रतीक भी मानते हैं। हालांकि, इन धारणाओं का आधार धार्मिक आस्था और लोकपरंपराएं हैं। राख या जली हुई लकड़ी को घर में रखने से बुरी नजर दूर होने अथवा समृद्धि बढ़ने का कोई स्थापित वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

इसके बावजूद स्थानीय लोगों की आस्था और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के कारण रावण दहन के बाद अवशेष इकट्ठा करने का सिलसिला जारी है।

बर्डघाट में 162 वर्षों से आयोजित हो रहा रामलीला मेला

बर्डघाट रामलीला मैदान में दशहरे का आयोजन भी अपनी लंबी परंपरा के लिए जाना जाता है। श्री श्री रामलीला समिति के अध्यक्ष गणेश वर्मा के अनुसार, यहां पिछले 162 वर्षों से रामलीला मेले का आयोजन किया जा रहा है। हर साल बड़ी संख्या में लोग रामलीला देखने और रावण दहन के उत्सव में शामिल होने पहुंचते हैं।

इस बार भी मेले में खान-पान, खिलौनों, सौंदर्य प्रसाधनों और घरेलू उपयोग की वस्तुओं की दुकानें लगाई गईं। बच्चों ने खिलौनों की दुकानों पर खरीदारी की, जबकि महिलाओं और अन्य आगंतुकों ने अपनी जरूरत के सामान खरीदे।

मेले में मिठाइयों की दुकानों पर भी लोगों की आवाजाही बनी रही। कई श्रद्धालुओं ने मिठाइयां खरीदकर भगवान श्रीराम को अर्पित कीं और उन्हें प्रसाद के रूप में घर ले गए।

रावण दहन के बाद भी मैदान में बना रहा उत्सव का माहौल

बर्डघाट रामलीला मैदान में रावण दहन के दौरान लोगों में खासा उत्साह दिखाई दिया। पुतले के जलने के बाद जहां कुछ लोग राख और लकड़ी इकट्ठा करने में जुट गए, वहीं कई परिवार मेले की रौनक का आनंद लेते रहे।

रावण दहन के साथ बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने वाला दशहरे का पर्व संपन्न हुआ। वहीं, लकड़ी और राख को घर ले जाने की स्थानीय परंपरा ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

बर्डघाट में हर साल होने वाला यह आयोजन धार्मिक आस्था, स्थानीय संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का संगम है। यही वजह है कि रावण दहन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं और उत्सव में हिस्सा लेते हैं।

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