आईना देखा
बुरा लगा
कुछ उभर आया
जो दबा रहा
अहंकार के ग़ुब्बारों में
सच देखा
बुरा लगा
कुछ ज़ख़्म हुआ
जो रिसता रहा
मतलब की दीवारों में
उपहास देखा
बुरा लगा
कुछ दम्भ हुआ
जो हँसता रहा
पत्थर के इंसानों में
जब अंतर्मन देखा
बुरा लगा
कुछ याद आया
जो ढका रहा
तारीफ़ों के नक्कारों में ।
:-पवन कुमार गंगवार

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