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भारत से जुड़े हथियार सौदे पर एस्टोनिया के रक्षा मंत्री ने दिया इस्तीफा, यूक्रेन को गोले सप्लाई करने का था मामला

नई दिल्ली: भारत की एक कंपनी से जुड़े हथियार सौदे को लेकर यूरोप के एस्टोनिया में बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। यूक्रेन को तोप के गोले उपलब्ध कराने के लिए किए गए एक समझौते पर सवाल उठने के बाद एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा है। इस सौदे की कीमत करीब 70 मिलियन यूरो यानी लगभग 800 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

मामला इटली की कंपनी डाटासेल से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, एस्टोनिया ने यूक्रेन के लिए आर्टिलरी शेल खरीदने का समझौता इसी कंपनी के साथ किया था। विवाद तब बढ़ा, जब सामने आया कि जिस कंपनी से गोला-बारूद की आपूर्ति का करार हुआ, उसने इससे पहले एक भी आर्टिलरी शेल का उत्पादन नहीं किया था।

भारत से कैसे जुड़ा है पूरा मामला?

डाटासेल को कुछ समय पहले महाराष्ट्र स्थित एक भारतीय कंपनी ने अधिग्रहण किया था। ऐसे में यूक्रेन के लिए गोला-बारूद की खरीद से जुड़ा यह सौदा अप्रत्यक्ष रूप से भारत से भी जुड़ गया।

एस्टोनिया की ऑडिट एजेंसी ने डाटासेल की उत्पादन क्षमता और इस तरह के बड़े रक्षा सौदे को पूरा करने की उसकी योग्यता पर सवाल उठाए थे। इसी के बाद सरकार और रक्षा मंत्रालय की भूमिका को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ने लगा।

करीब 800 करोड़ रुपये का था समझौता

बताया जा रहा है कि एस्टोनिया ने यूक्रेन को आर्टिलरी शेल उपलब्ध कराने के लिए लगभग 70 मिलियन यूरो का समझौता किया था। भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत करीब 800 करोड़ रुपये बैठती है।

इन गोला-बारूद की आपूर्ति यूक्रेन को की जानी थी, जहां रूस के खिलाफ जारी युद्ध में इनका इस्तेमाल होना था। इस खरीद के लिए रूस से जुड़े फ्रीज किए गए फंड से रकम इस्तेमाल किए जाने की बात भी सामने आई है।

ऑडिट रिपोर्ट के बाद बढ़ा विवाद

इस रक्षा सौदे को लेकर एस्टोनिया की ऑडिट एजेंसी ने कंपनी की क्षमता पर गंभीर सवाल उठाए। मुख्य चिंता यह थी कि डाटासेल के पास आर्टिलरी शेल बनाने का पहले से पर्याप्त अनुभव नहीं था।

मामला सामने आने के बाद रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर पर भी सवाल उठने लगे। इसके बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने का फैसला किया।

रक्षा मंत्री ने अपने बचाव में क्या कहा?

इस्तीफे के बाद पेवकुर ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्होंने सौदे से संबंधित फाइलों को खुद नहीं पढ़ा था। उनका कहना था कि रक्षा मंत्री के तौर पर उनकी भूमिका संबंधित सौदों को मंजूरी देने तक सीमित थी।

हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ दिया। पेवकुर ने वर्ष 2022 में एस्टोनिया के रक्षा मंत्री का पद संभाला था।

पूर्व प्रधानमंत्री काजा कैलिस के करीबी माने जाते हैं पेवकुर

हन्नो पेवकुर को एस्टोनिया की पूर्व प्रधानमंत्री काजा कैलिस का करीबी सहयोगी माना जाता है। कैलिस ने 2024 में एस्टोनिया के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद यूरोपीय संघ में विदेश नीति और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी संभाली।

काजा कैलिस रूस के खिलाफ अपने कड़े रुख के लिए जानी जाती हैं। एस्टोनिया भी रूस के पड़ोसी देशों में शामिल है और यूक्रेन के समर्थन में यूरोपीय देशों के साथ मजबूती से खड़ा रहा है।

रूस और एस्टोनिया के बीच तनाव का लंबा इतिहास

एस्टोनिया पहले सोवियत संघ का हिस्सा था और अब वह यूरोपीय संघ तथा नाटो का सदस्य है। रूस के साथ उसके संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं।

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद एस्टोनिया ने भी कीव को समर्थन दिया है। यूरोप के कई देशों की तरह वह यूक्रेन को सैन्य सहायता उपलब्ध कराने में शामिल रहा है। इसी क्रम में यूक्रेन के लिए गोला-बारूद की खरीद का यह समझौता किया गया था।

हालांकि, जिस कंपनी से यह सौदा किया गया उसकी उत्पादन क्षमता पर उठे सवालों ने पूरे मामले को विवाद में बदल दिया। फिलहाल इस मामले में भारत की संबंधित कंपनी की ओर से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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