अब न उसपे मुझे यक़ीन रहा
जो हमेशा मिरा अमीन रहा
लोग तो खेलते रहे दिल से
और मैं बस तमाश-बीन रहा
मैं तो समझा था दिल मेरा है मगर
ये किसी और का रहीन रहा
जो मुझे ढूँढता रहा हर सम्त
उसके दिल में ही मैं मकीन रहा
जो ये कहता था आसमान हूँ मैं
देखता सिर्फ़ वो ज़मीन रहा
किस तरह उसको मैं समझ पाता
वो सदा ज़ेर-ए-आस्तीन रहा
जिसमें नफ़रत नहीं महब्बत है
वो ही “संतोष” मेरा दीन रहा
:-Santosh Khirwadkar
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