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इस्लामी क्रांति के लीडर और शिया रहनुमा अयातुल्लाह ख़ुमैनी का अपमान असहनीय है: मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद

इस्लामी क्रांति के लीडर और शिया रहनुमा अयातुल्लाह ख़ुमैनी का अपमान असहनीय है: मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद

उलेमा ने मांग करते हुए कहा है कि किताब का वितरण तुरंत रोका जाए और जहां भी किताब पहुंची है उसे वापस लिया जाए

लखनऊ 27 अप्रैल: एनसीईआरटी की छठी कक्षा की किताब में अयातुल्लाह सैय्यद रूहुल्लाह ख़ुमैनी के बारे में प्रकाशित गलत और अपमानजनक शब्दों की निंदा करते हुए मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद ने मुद्रक, प्रकाशक और संकलनकर्ता के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उलेमा ने कहा कि मुद्रक और प्रकाशक ने इस संबंध में माफीनामा जारी किया है

और यह भी मालूम है के इमाम ख़ुमैनी के बारे में जो शब्द प्रकाशित किए गए थे उन्हें हटा दिया गया है, लेकिन यह काफी नहीं है। उन्हें इस किताब का वितरण बंद कर के जहाँ जहाँ ये किताब पहुंची है, तुरंत इसकी प्रतियां वापस लेनी चाहिए और इमाम ख़ुमैनी के व्यक्तित्व को उनकी शान के मुताबिक़ पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये।

मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के सदस्यों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि पाठ्यपुस्तक को प्रकाशित करने वाली संस्था और इसे संकलित करने वाले दोनों दोषी हैं। उन्हें पहले इमाम ख़ुमैनी के जीवन और इंक़ेलाब की फ़िक्री बुनियादों के बारे में मालूमात हासिल करनी चाहिए थी। इमाम ख़ुमैनी ने कभी भी इस्लाम के अलावा अन्य धर्मों के खिलाफ कोई अपमानजनक बात नहीं कही और गैर-मुसलमानों की हत्या या अपमान के बारे में कोई बयान नहीं दिया। उन्होंने ईरान के शाह और औपनिवेशिक शक्तियों के अत्याचार और तानाशाही निज़ाम के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया था, जिसमें उलेमा और जनता उनके साथ थे और उन्होंने अनगिनत बलिदान देकर क्रांति को सफल बनाया था। उलेमा ने कहा कि ईरान और भारत के संबंध सदैव दोस्ताना और सौहार्दपूर्ण रहे हैं। इमाम खुमैनी की मृत्यु के बाद भारत में शोक की घोषणा की गई, इससे पता चलता है कि इमाम ख़ुमैनी का व्यक्तित्व सार्वभौमिक था। वह न केवल एक राजनीतिक लीडर थे, बल्कि एक धार्मिक लीडर भी थे, जिनके ज्ञान और राजनीतिक विचारधारा को दुनिया भर की हस्तियों ने स्वीकार किया है।

उलेमा कहा कि ईरान में आज भी बड़ी संख्या में पारसी मौजूद हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद गैर-मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया गया। मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना कल्बे जवाद नक़वी ने कहा कि इस पाठ्यपुस्तक के प्रकाशक और मुद्रक को तुरंत इस किताब का वितरण बंद करना चाहिए और जो किताबें बाज़ार और स्कूलों में पहुंच चुकी हैं उन्हें वापस लिया जाये। साथ ही इसे सही कर के किताब को दोबारा बाज़ार में भेजें ताकि छात्र इमाम ख़ुमैनी के व्यक्तित्व के बारे में गुमराह न हों। मौलाना ने कहा कि इमाम ख़ुमैनी ने हमेशा मज़लूमों, वंचितों और मानवता के लिए काम किया। मौलाना ने कहा कि इस किताब में उन हस्तियों को अत्याचारी और तानाशाह कहा गया है जो अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ थे। आख़िर इस सूची में दुनिया के सबसे बड़े तानाशाहों को क्यों शामिल नहीं किया गया है, जिसमें नेतन्याहू और बाइडन का नाम सबसे पहले होना चाहिए। ग़ाज़ा में नेतन्याहू ने निर्दोष बच्चों, महिलाओं और युवाओं का नरसंहार किया है उसको शामिल किया जाना चाहिए था? दूसरे इजराइल जिसकी मदद से ये नरसंहार कर रहा है उसको भी शामिल करना चाहिए, जिसमें सबसे आगे अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन हैं।

मजलिस-ए-उलेमा-ए-हिंद के सदस्यों में मौलाना हुसैन मेहदी हुसैनी मुंबई, मौलाना मुहम्मद अली मोहसिन तक़वी दिल्ली, मौलाना सैय्यद कल्बे जवाद नक़वी, मौलाना तक़ी हैदर नक़वी दिल्ली, मौलाना आबिद अब्बास मुज़फ्फरनगरी, मौलाना रज़ा हुसैन रिज़वी, मौलाना तसनीम मेहदी ज़ैदपुरी, मौलाना तक़ी आग़ा हैदराबाद, मौलाना निसार अहमद ज़ैनपुरी, मौलाना सफदर हुसैन जौनपुरी, मौलाना करामत हुसैन जाफरी कश्मीर, मौलाना ग़ुलाम मेहदी खान चेन्नई, मौलाना अज़हर अली आबिदी अलीपुर, मौलाना रज़ा हैदर ज़ैदी, मौलाना सरताज हैदर ज़ैदी, मौलाना अहमद रज़ा चेन्नई, मौलाना अमानत हुसैन बिहार, और अन्य उलेमा शामिल हैं।

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