नये ज़माने की फ़िज़ा :
———————–
कितने ही शेरिश-ए-तूफाँ सफ़र में आए मगर ,
कौन दश्त-ए-तलब में चिराग़ रोशन कर गया।
बामुश्किल आरज़ुओं को सीने में दफ़न किया ,
एक झोंका हवा का जाने क्यों बेचैन कर गया।
ख़्वाबों का हक़ीक़त होना तो उसका करम था ,
कौन आके तमन्नाओं को ज़मीदोज़ कर गया।
इस मुक़ाम पे अब ख़ुद ही मुस्करा लेते हैं हम ,
कौन दिल-आवेज़ मुस्कराहट फ़ना कर गया।
इस दौर में हर तरफ़ रुसवाइयाँ ही हैं मगर ,
उसका तसव्वुर आज क्यों चश्मे-तर कर गया।
लोग तो शौक़े-फ़ितरत में आशियाँ बना लेते हैं ,
कौन इस ज़माने में रिश्तों को तन्हा कर गया।
योगेंद्र कुमार
शेरिश-ए-तूफाँ = तूफ़ान का उपद्रव
दश्त-ए-तलब = चाहतों का रेगिस्तान
दिल-आवेज़ = मन को लुभाने वाली
चश्मे-तर कर गया = आँखों को नम कर गया
Global Express Live