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जीवन में गुरु जरूरी है ,गरूर नहीं…..!!! मिर्ज़ा अज़हर अब्बास

जीवन में गुरु जरूरी है ,गरूर नहीं…..!!! मिर्ज़ा अज़हर अब्बास

एक पिता ने अपने गुस्सैल लड़के से तंग आकर उसे कीलों से भरा एक थैला देते हुए कहा

*तुम्हें जितनी बार क्रोध आए तुम थैले से एक कील निकाल कर बाड़े में ठोक देना*

लड़के को अगले दिन जैसे ही क्रोध आया उसने एक कील बाड़े की दीवार पर ठोक दी। यह प्रक्रिया वह लगातार करता रहा।धीरे धीरे उसकी समझ मे आने लगा कि कील ठोकने की व्यर्थ मेहनत से अच्छा तो अपने क्रोध पर नियंत्रण करना है और क्रमशः कील ठोकने की उसकी संख्या कम होती गई। एक दिन ऐसा भी आया कि लड़के ने दिन मे एक भी कील नहीं ठोकीं।

उसने खुशी खुशी यह बात अपने पिताजी को बताई। वे प्रसन्न हुए और कहा

*जिस दिन तुम्हें लगे कि तुम एक बार भी क्रोधित नहीं हुए, ठोकीं हुई कील मे से एक कील निकाल लेना।*

लड़का ऐसा ही करने लगा। एक दिन ऐसा भी आया कि बाड़े मे एक भी कील नहीं बची। उसने खुशी खुशी यह बात अपने पिताजी को बताई। पिताजी उस लड़के को बाड़े मे लेकर गए और कीलों के छेद दिखाते हुए पूछा

*क्या तुम ये छेद भर सकते हो?*

लड़के ने कहा नहीं तो पिताजी ने उससे कहा

*क्रोध मे तुम्हारे द्वारा कहे गए गलत शब्द, दूसरे के दिल पर ऐसे ही छेद करते हैं जिसकी भरपाई भविष्य मे तुम नहीं कर सकते।*

जरा सोचिए कहीं आप भी बाड़े मे एक कील ठोकने तो नहीं जा रहे..

*रिश्ते अंकुरित होते हैं प्रेम से,*
*जिंदा रहते हैं संवाद से !*
*महसूस होते हैं संवेदनाओं से !*
*जिये जाते हैं दिल से !*
*मुरझा जाते हैं गलत फहमियों से !*
*बिखर जाते हैं अंहकार से!*
*और मर जाते हैं शीत-युद्ध से.!*
*यही कटुसत्य है.!*

-मिर्ज़ा अज़हर अब्बास 1/1/2018

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