19 रमज़ान, हज़रत अली (अस) और मस्जिद ए कूफ़ा
यह मस्जिदों में नमाज़ी जो क़त्ल होते हैं
यह रस्म कब से चली इब्तिदा तलाश करो !
इब्ने मुल्ज़िम के हाथ बंधे हुए थे,चेहरा ख़ौफ़ से पीला पड़ चुका था और बदन थर थर कांप रहा था । उसने दुनिया की तारीख़ में सबसे बड़े गुनाहों में से एक से अपने हाथ रँग लिए थे । वह मुल्ज़ीमो की तरह घसीट कर लाया जा रहा था ।

उसपर नज़र पड़ी उनकी,जिनकी पुष्ट पर नमाज़ पढ़ते हुए,उसने बड़ी ही कायरता से हमला किया था । ज़ख़्मी हालत में उन्होंने उसपर नज़र डाली और बेटे की तरफ इसकी रस्सी खोलने का इशारा किया । सारा मजमा उस माहौल में सकते में,उन्होंने फिर कहा,यह प्यास होगा,इसे पानी पिलाओ । हर तरफ लोग यह देखकर हैरत में की यह क्या हो रहा है । एक क़ातिल के साथ ऐसा बर्ताव,उसकी रस्सी खोल दी गईं,पानी उसके सूख चुके होठों तक पहुँच गया । तब उन्होंने कहा कि इसने जो ज़ख़्म हमें दिए हैं, उसकी तक़लीफ़ से ज़्यादा इसको सज़ा मत देना । सज़ा गुनाह के बराबर देना,यही इंसाफ है ।
ज़माने ने देखा,जो हमेशा से देखता था,आज आख़री बार देखा कि यह अली हैं, हज़रत अली । जो इंसाफ की किताब थे । जो ताक़त में बेजोड़ थे । जो अपनी आख़री सांस के नज़दीक खड़े भी,वह नसीहत कर रहे थे,जो ज़माने की चाल बदलने वाली थी । इंसाफ से काम लिया जाए,ऐसी इतनी बड़ी कोई मिसाल नही मिलती ।

वह आज का ही दिन था,19वीं रमज़ान । हज़रत अली मस्जिद में थे,नमाज़ के लिए सर सजदे में था,दुश्मन खम्बे की आड़ में था । जैसे ही सर सजदे से उठा,उसने पीठ पीछे से सर पर वार किया । हज़रत अली तो नमाज़ में थे,अगर यूहीं बैठे होते,तो उसकी इतनी हिम्मत न थी कि सीधा खड़ा हो सके । हज़रत अली की ज़िन्दगी और उनके फ़लसफ़े ज़माने की तालीम का ऐसा हिस्सा हैं, जो हर आने वाली नस्लों को रौशनी दिखाते रहेंगे ।
आज उस मरदूद के ज़हर बुझे खँजर ने हज़रत अली को ज़ख़्मी किया था । यह वही रमज़ान थे जिसमें कुरान ए पाक ज़मीन पर उतरा और यह वही महीना था, उसे सीने में बसाने वाला,उसके रास्ते पर चलने वाला पहला बच्चा,जो देखते देखते इल्म का दरवाज़ा कहलाने लगा था,ज़ख़्मी होकर ज़मीन पर थे ।
हमें सीखना यह है कि हालात चाहे जितने बुरे हों,सांसे चाहे सारी उखड़ने को हों,जिस्म से खून रिसता हो मगर इंसाफ का साथ नही छोड़ना है । जिसने इंसाफ का साथ छोड़ दिया, उसने मौला अली का साथ छोड़ दिया । जिसने ज़ुल्म की मुख़ालफ़त छोड़ दी,उसने मौला अली का रास्ता छोड़ दिया । जिसने इल्म हासिल करना छोड़ दिया,उसने मौला अली की खुशबू छोड़ दी । आज उनकी उस तक़लीफ़ को याद कीजिये और सोचिए इतने दर्द में भी वह क्या है, जो हमें नही छोड़ना है, दुश्मन के सूखते होंठों की फिक्र करना भी मेरे अली का रास्ता ही है….
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