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चाय के स्वाद में बनेगा करियर, टी टेस्टर बनने के लिए चाय बोर्ड शुरू करेगा सर्टिफिकेट कोर्स।

नई दिल्ली: भारत समेत कई देशों में चाय एक आवश्यक पेय पदार्थ के तौर पर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल है। अपना आलस छोड़ने से लेकर घर में आए मेहमान को मनुहार करने तक, हर मौके पर चाय का जिक्र सबसे पहले आता है। चाय के स्वाद के शौकीन हर जगह मिल जायेंगे। ऐसे में आपको बता दें कि आज दुनिया में सबसे ज्यादा पसंद किये जानेवाले करियर विकल्पों में से एक टी-टेस्टर भी है। इसमें न केवल चाय का स्वाद चखना होता है, बल्कि अलग-अलग किस्मों की चाय के बीच के अंतर को भी पहचाना पड़ता है।

चाय चखकर बनाए करियर

वाणिज्य मंत्रालय के तहत भारतीय चाय बोर्ड युवाओं को कौशल प्रदान करने और इस क्षेत्र में टूरिज्म को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चाय का स्वाद पता लगाने (टी-टेस्टिंग) के लिए सर्टिफिकेट कोर्स शुरू करने की संभावना तलाशेगा। बुधवार को एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने यह जानकारी दी है। बता दें कि 21 मई को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस दुनियाभर में चाय के सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व को उजागर करता है और इस क्षेत्र में श्रमिकों के योगदान को मान्यता देता है।

‘चाय साक्षरता’ को मिलेगा बढ़ावा

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस पर वाणिज्य सचिव सुनील बर्थवाल ने कहा कि ऐसे सिलेबस देश में ‘चाय साक्षरता’ को बढ़ावा देने में भी मदद करेंगे। बर्थवाल ने कहा, ‘‘चाय बोर्ड देश में चाय के स्वाद के लिए सर्टिफिकेट कोर्स का एक केंद्र स्थापित करने को कदम उठा रहा है।’’ विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे कोर्स चाय का स्वाद पता लगाने के क्षेत्र में सुव्यवस्थित ट्रेनिंग प्रदान करेंगे क्योंकि यह उद्योग के लिए आवश्यक एक विशेष कौशल है। यह स्वाद बताने की प्रथाओं को मानकीकृत करने और युवा पेशेवरों को एक मान्यता प्राप्त योग्यता प्रदान करने में भी मदद करेगा। इससे चाय पर्यटन को बढ़ावा देने में भी योगदान मिलेगा।’’

टी-टेस्टर क्या करते हैं?

टी-टेस्टर चाय की गुणवत्ता और सुगंध के अनुसार उसकी किस्मों को बांटने में मदद करता है। चाय के स्वाद को परखना पूरी तरह से एक कला है। टी-टेस्टर एक विशेष स्वाद को प्राप्त करने के लिए विभिन्न तरीकों से सलाह दे सकता है।

वित्त वर्ष 2024-25 में चाय का निर्यात इससे पिछले वित्त वर्ष के 83 करोड़ डॉलर से बढ़कर 92 करोड़ डॉलर हो गया। प्रमुख उत्पादक राज्यों में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल शामिल हैं, जहाँ 81 प्रतिशत उत्पादन घरेलू स्तर पर खपत होता है।

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