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क़ुदरत का चलन बदला न मगर ….हम लुत्फ़ उठाना भूल गये :-डॉ.पूनम यादव

क्या दौरे-तरक़्क़ी आया है
हम मौज मनाना भूल गये
खोना-पाना तो याद रहा
बस हँसना गाना भूल गये

आते ही गर्मियों की छुट्टी
घर मामा का तरसाता था
वो मित्र-मंडली मस्तानी
गुल्ली-डंडा हर्षाता था
अब लैपटॉप साथी सबका
नानी और नाना भूल गये
खोना-पाना तो याद रहा
बस हँसना गाना भूल गये।

जब फ़ुरसत होती थी तो सब
मिलकर छत पर आ जाते थे
और खोल के याद-पिटारी को
सब हँसते थे बतियाते थे
अब बैठ गुनगुनी धूप तले
रेवड़ियाँ खाना भूल गये
खोना-पाना तो याद रहा
बस हँसना गाना भूल गये।

अँगड़ाई लेती ऋतु बसंत
आने को अब भी आती है
धरती की धानी चूनर बन
पीली सरसों लहराती है
क़ुदरत का चलन बदला न मगर
हम लुत्फ़ उठाना भूल गये
खोना-पाना तो याद रहा
बस हँसना गाना भूल गये।

:- डॉ.पूनम यादव

 

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